इंजीनियरों की भूमिका उत्सर्जन नियंत्रण में निर्णायक

– एआई, उद्योग और शहरीकरण से भारत की बिजली मांग दोगुनी होने की संभावना
– एमआईटी-डब्ल्यूपीयू में वैश्विक विशेषज्ञों की चर्चा

देहरादून/पुणे। भारत में एआई आधारित डेटा सेंटरों, स्टील प्लांट्स, सीमेंट उद्योग और तेज शहरीकरण के कारण अगले दो दशकों में बिजली की मांग लगभग दोगुनी हो सकती है। हालांकि, 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना काफी नहीं होगा, बल्कि कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना सबसे बड़ी चुनौती है। यह बात पुणे के एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (एमआईटी-डब्ल्यूपीयू) में आयोजित 29वें एनुअल इंडस्ट्री-इंस्टीट्यूट इंटरएक्शन प्रोग्राम (एआईआईआईपी-2026) के दौरान वैश्विक ऊर्जा विशेषज्ञों ने कही।
एसपीई एमआईटी-डब्ल्यूपीयू स्टूडेंट चैप्टर द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में “रिस्किल. रिवायर. रीइग्नाइट: कम कार्बन उत्सर्जन के लिए कुशल इंजीनियर” विषय पर विशेष पैनल चर्चा हुई। इसमें बीपी, एक्सॉनमोबिल, बेकर ह्यूजेस, शेवरॉन और कोरम सॉफ्टवेयर जैसी कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत वर्तमान में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। एआई और क्लाउड कंप्यूटिंग के विस्तार से डेटा सेंटरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जो 24×7 बिजली और उन्नत कूलिंग सिस्टम की मांग करते हैं। अनुमानों के मुताबिक, 2030 तक डेटा सेंटरों की बिजली खपत 40-50 टीडब्ल्यूएच तक पहुंच सकती है, जो कुल बिजली मांग का 2.5-3% होगा। स्टील, सीमेंट और परिवहन क्षेत्रों का विस्तार तथा शहरीकरण भी इस मांग को बढ़ावा दे रहे हैं।
बीपी की टेक्निकल सॉल्यूशंस इंडिया प्रमुख मोली क्रोमा ने कहा, “ऊर्जा के सभी रूपों की जरूरत है। उत्सर्जन कमी कार्यक्षमता सुधार से शुरू होती है। मूल सिद्धांत वही रहेंगे, लेकिन उनका उपयोग पर्यावरण-अनुकूल तरीके से करना होगा।” एक्सॉनमोबिल के इयान मैकफी ने कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (सीसीएस) को पारंपरिक इंजीनियरिंग कौशलों का विस्तार बताया। बेकर ह्यूजेस के प्रदीप शुक्ला ने भू-यांत्रिक अध्ययन और विशेष कुओं के निर्माण पर जोर दिया। शेवरॉन के चेतन चव्हाण ने पूरी वैल्यू चेन में ‘कार्बन साक्षरता’ की आवश्यकता बताई, जबकि कोरम सॉफ्टवेयर की तितिक्षा मुखर्जी ने एआई की भूमिका पर कहा कि यह प्रक्रियाओं को तेज कर सकती है, लेकिन इंजीनियरों को इसका प्रबंधन करना होगा।
सभी विशेषज्ञों ने सहमति जताई कि ऊर्जा परिवर्तन चरणबद्ध होगा। हाइड्रोकार्बन, सौर, पवन, हाइड्रोजन, भू-तापीय और सीसीएस का संयुक्त उपयोग जरूरी है। ऊर्जा सुरक्षा और उत्सर्जन कमी के संतुलन में इंजीनियरों की कुशलता महत्वपूर्ण होगी।
छात्रों को सलाह दी गई कि वे मूल इंजीनियरिंग के साथ डेटा साइंस, ऑटोमेशन और पर्यावरण प्रबंधन का समन्वय करें। यह चर्चा भारत के आर्थिक विकास और जलवायु लक्ष्यों को साथ लाने की चुनौती को रेखांकित करती है, जहां नवाचारी इंजीनियरिंग ही कम कार्बन भविष्य सुनिश्चित कर सकती है।

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