विकास और पर्यावरण को प्रतिद्वंदी नहीं पूरक बनाना होगा: राज्यपाल

  • दून विवि में इंडियन एसोसिएशन आफ सोशल साइंस इंस्टीट्यूशंस का 24वां अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न

देहरादून। दून विश्वविद्यालयमें इंडियन एसोसिएशन आफ सोाल साइंस इंस्टीट्यूशंस का 24वां अंतराष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न हो गया। तीन दिवसीय सम्मेलन में देश—विदेश से विद्वानों ने विभिन्न सत्रों में सामाजिक कल्याण, अर्थशास्त्र, रोजगार, उद्योग, कृषि, तकनीकी, पर्यावरण और नगरीकरण जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श किया।

 

रविवार को सम्मेलन के समापन सत्र में राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि.) ने कहा कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि पूरक बनाना ही सच्चा सतत विकास है। जलवायु परिवर्तन आज केवल वैज्ञानिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। अनियोजित शहरीकरण, अंधाधुंध वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन इसके प्रमुख कारण हैं। इस संकट से निपटने के लिए केवल नीतियां तकनीक पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि हमें जीवन शैली में परिवर्तन, जनसहभागिता और प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहकर नीतियां बनानी होगी। राज्यपाल ने कहा कि पर्वतीय राज्यों के लिए पर्यावरणीय चुनौतियां और भी संवेदनशील हैं। भूस्खलन, मृदा क्षरण, नदियों का कटाव और वन्य जीवों के आवासों में कमी जैसे मुद्दे अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्थिरता से भी जुड़े चुके हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी, वैज्ञानिक और पारंपरिक ज्ञान का समन्वय तथा जनजागरूकता और शिक्षा तीनों को एक साथ जोड$ना आवश्यक है। साथ ही स्मार्ट सिटीज के साथ—साथ ग्रीन सिटीज की भी परिकल्पना करनी होगी। दून विवि की कुलपति प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने विश्वविद्यालय का उद्देश्य अकादमिक रिसर्च और गवर्नेंस के बीच की दूरी को कम करना है, ताकि प्रमाण आधारित निष्कर्षों के जरिए नीतियाँ अधिक समावेशी और प्रभावी बन सकें।
सम्मेलन में यूनेस्को की असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल फार सोशल एंड ह्यूमन साइंसेज गैब्रिएला रामोस, डा. नागेश कुमार, प्रोफेसर एस महेन्द्र देव (अध्यक्ष, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद), प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी (कुलपति नालंदा विवि), अर्थशास्त्री डा. अजीत रानाडे, डा. सब्यसाची साहा, डा. एसके मोहंती, डा. दीपंकर सेनगुप्ता आदि  ने विचार व्यक्त किये। आयोजन सचिव और स्कूल आफ सोशल साइंसेज के डीन प्रोफेसर आरपी ममगाईं ने बताया कि तीन दिनों तक चले सम्मेलन में 25 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।

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