शोध प्रक्रिया में पारदर्शिता और सरलता की आवश्यकता : डॉ मेघा अग्रवा

 

 

ऋषिकेश(अंकित तिवारी): शोध के क्षेत्र में आज जो चुनौतियां सामने आ रही हैं, उनके समाधान पर विचार करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। “द कोबलस्टोन्स ऑफ रिसर्च: हाउ टू मेक इट ईज़ियर?” नामक एक लेख में शोधकर्ताओं मेघा अग्रवाल और ज्ञान वर्धन ने शोध में आने वाली कठिनाइयों पर गहराई से चर्चा की है।

 

एम्स जम्मू की शरीर क्रिया विज्ञान विभाग की सह-आचार्य डॉ मेघा अग्रवाल ने अपने शोध पत्र में बताया कि शोध प्रक्रिया में अनैतिक व्यवहार, जटिल समीक्षात्मक प्रक्रियाएं, अपर्याप्त वित्तीय सहायता, और समय की कमी जैसे मुद्दे न केवल शोधकर्ताओं के उत्साह को प्रभावित करते हैं, बल्कि शोध की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। लेख में “पब्लिश या परिश” संस्कृति और प्रिडेटरी जर्नल्स’ के बढ़ते चलन पर चिंता व्यक्त की गई है, जो शोध को मात्र एक औपचारिकता में बदल रहा है।

 

एम्स ऋषिकेश के फार्माकोलॉजी विभाग के सीनियर रेजिडेंट डॉ ज्ञान वर्धन ने बताया कि लेख में सुझाए गए उपायों में शोध को अनिवार्य बनाने के बजाय इच्छानुसार चुनने की स्वतंत्रता देना, शोध के लिए वित्तीय और संरचनात्मक समर्थन बढ़ाना, और नैतिक समीक्षाओं की प्रक्रिया को अधिक सरल और प्रभावी बनाना शामिल है। इसके अतिरिक्त, लेख में यह सुझाव दिया गया है कि शोध पत्रों के प्रकाशन को अधिक सुगम और सुलभ बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकरण लागू किया जाए।

 

शोधार्थियों ने बताया कि यह आलेख शोध के क्षेत्र में सुधार और शोधकर्ताओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक सार्थक पहल का आह्वान करता है। समाज और विज्ञान की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि शोध प्रक्रिया को पारदर्शी, प्रोत्साहक और प्रेरणादायक बनाया जाए।

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