- मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दून विश्वविद्यालय में किया राष्ट्रीय समाज विज्ञान सम्मेलन का उद्घाटन
- जलवायु चुनौतियों से निपटने में एआई की भूमिका पर प्रकाश डाला
देहरादून। 10 अक्टूबर: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज कहा कि राज्य सरकार विकास का ऐसा मॉडल अपनाने के लिए प्रतिबद्ध है जो पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखे। उन्होंने देश के प्रमुख समाज वैज्ञानिकों से अपील की कि वे नीति निर्माण में साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण को अपनाते हुए एक व्यापक और व्यावहारिक नीति-रोडमैप तैयार करने में योगदान दें।
मुख्यमंत्री धामी दून विश्वविद्यालय में शुरू हुए इंडियन एसोसिएशन ऑफ सोशल साइंस इंस्टीट्यूशन्स )के 24वें वार्षिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बोल रहे थे। मुख्यमंत्री धामी ने सामाजिक न्याय, गरीबी उन्मूलन और समावेशी विकास पर सरकार के निरंतर फोकस को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार नई तकनीकों, विशेष रूप से एआई का उपयोग बढ़ा रही है ताकि प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके। खासकर उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में। दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने कहा कि सम्मेलन के विषय जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और आजीविका सशक्तिकरण आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने हमेशा साक्ष्य आधारित शोध को प्राथमिकता दी है, जिन्हें कई बार राज्य स्तर की नीतियों में सीधे रूप से शामिल किया गया है। प्रो. डंगवाल ने मुख्यमंत्री के उस पहल की सराहना की जिसके तहत दून विश्वविद्यालय में हिंदू स्टडीज़ को एक शैक्षणिक विषय के रूप में शुरू किया गया। उन्होंने उत्तराखंड सरकार द्वारा महिलाओं, विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों की महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए शुरू की गई नवाचारी और आत्मनिर्भर पहलों की भी प्रशंसा की।
नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के दबावों के बावजूद भारत का कृषि उत्पादन स्थिर और बढ़ते रुझान पर है। उन्होंने इस स्थिरता का श्रेय फसलों के विविधीकरण, सिंचाई अवसंरचना के विस्तार और कृषि अनुसंधान एवं विकास में निवेश को दिया। उन्होंने भारत के पर्वतीय राज्यों के विकास का विस्तृत सांख्यिकीय विश्लेषण प्रस्तुत किया, जिसमें सिक्किम को एक उत्कृष्ट मॉडल बताया जहाँ प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से तीन गुना अधिक है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में ग्रामीण पलायन के कारण बंजर भूमि की समस्या बढ़ रही है और इसके समाधान के लिए बागवानी और क्लस्टर फार्मिंग जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया जा सके। नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने विज्ञान और समाज के बीच मौजूद खाई को पाटने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने समाज विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान के साथ जोड़ने की वकालत की। प्रो. चतुर्वेदी ने शोध में अनैतिक प्रवृत्तियों जैसे डेटा में हेरफेर कर गलत सांख्यिकीय परिणाम दिखाने पर चिंता व्यक्त की और कहा कि यह शोध की विश्वसनीयता पर संकट पैदा कर रहा है। उन्होंने अकादमिक विचारधारा के “औपनिवेशिक प्रभाव” से बाहर निकलने और भारतीय ज्ञान परंपरा को अपनाने पर बल दिया। दून विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान संकाय के डीन और सम्मेलन के संयोजक प्रो. आर. पी. ममगाईं ने सम्मेलन के प्रमुख विषय जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियाँ, शहरीकरण और सस्टेनेबल डेवलपमेंट, तथा आजीविका और वेल-बीइंग में सुधार पर जोर दिया।
सम्मेलन दून विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान स्कूल के अर्थशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित किया जा रहा है। इसमें विशेषज्ञों के नेतृत्व में कई तकनीकी सत्र और शोध प्रस्तुतियाँ होंगी, जिनमें टेक्नोलॉजी और संस्कृति का विकास में योगदान, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित आजीविका, पर्वतीय नगरों के लिए हरित विकास मार्ग, और उत्तराखंड में जलवायु-संवेदनशील शहरी नियोजन व कचरा प्रबंधन जैसे विषय शामिल हैं। 12 अक्टूबर को होने वाले समापन सत्र की अध्यक्षता उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह करेंगे।
तीन दिन तक चलने वाला यह राष्ट्रीय सम्मेलन देशभर के 400 से अधिक समाज वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं को एक मंच पर ला रहा है, जहाँ वे सस्टेनेबल डेवलपमेंट, क्लाइमेट रेज़िलियंस और लाइवलीहुड सिक्योरिटी जैसे विषयों पर चर्चा करेंगे, विशेषकर हिमालयी क्षेत्र की चुनौतियों के संदर्भ में।