देहरादून। उत्तराखंड ज्योतिष रत्न आचार्य डॉक्टर चंडी प्रसाद घिल्डियाल “दैवज्ञ”ने श्रीमद् भागवतकथा व्यास के रूप में 17 सितंबर 2024 से शुरू होकर 2 अक्टूबर तक चल रहे पितृपक्ष का अद्भुत रहस्य प्रकट किया है।
**आचार्य दैवज्ञ ने बताया है कि मृत्यु लोक में पितृपक्ष की परंपरा महाभारत के दानवीर कर्ण की वजह से प्रारंभ हुई है, इसका रहस्य उद्घाटन करते हुए उन्होंने बताया कि जब दानवीर कर्ण युद्ध में वीरगति को प्राप्त होकर स्वर्ग लोक में गए तो उन्हें खाने के लिए सोना चांदी आदि दिया जाने लगा जिस पर उन्होंने इंद्र के सामने आश्चर्य व्यक्त*किया।
*तब स्वर्ग के राजा इंद्र ने उन्हें कहा कि हे दानवीर कर्ण ! तुमने अपने जीवन काल में सोना और चांदी का ही दान किया है ,कभी अन्न और जल का दान नहीं किया है,इसलिए तुम्हें वह प्राप्त नहीं हो सकता है, इस पर कर्ण ने सभी देवताओं से क्षमा प्रार्थना करते हुए कहा कि उन्हें अपने पूर्वजों के बारे में कुछ भी ज्ञान न होने की वजह से वास्तव में उन्होंने कभी श्राद्ध कर्म नहीं किया जिसमें अन्न और जल का दान किया जाए, उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवताओं ने उसे 16 दिन का समय देकर वापस मृत्यु लोक में भेजा, पृथ्वी पर आकर भाद्रपद मास की पूर्णमासी से आश्विन मास की अमावस्या तक 16 दिन कर्ण ने अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया अन्न और जल का दान किया, तब उनके पितरों का मोक्ष हुआ और उन्हें स्वर्ग में सुख की प्राप्ति हुई।*
*श्रीमद् भागवत के मर्मज्ञ डॉ चंडी प्रसाद दैवज्ञ ने बताया कि पितृ लोक में सभी सुख हैं, परंतु वहां पर जल की अत्यंत कमी होने से पितर प्यासे रह जाते हैं इसलिए इन 16 दिनों में जहां भी जल गिराया जाता है ,वह पितरों को प्राप्त होता है, इसलिए सूर्य उदय के बाद स्नान एवं कपड़े धोने का कार्य नहीं करना चाहिए अन्यथा सूर्य की रश्मियों से वह जल भी पितरों को प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि पिंडदान एवं अन्न दान करने से जहां पितरों को मुक्ति प्राप्त होती है ,तो तिल और दूध के जल से तर्पण करने से उन्हें संतुष्टि प्राप्त होती है।*