देहरादून, 18 अगस्त। बदलती जीवनशैली, सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और पढ़ाई को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। विशेषज्ञों ने कहा कि अकेलापन, दूसरों से तुलना और अभिभावकों की अपेक्षाओं का अतिरिक्त दबाव मानसिक तनाव और अवसाद का कारण बन सकता है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समय रहते जागरूकता और बच्चों के साथ खुलकर संवाद बेहद जरूरी है।
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के देहरादून परिसर में मंगलवार को नेशनल एसोसिएशन ऑफ प्रोफेशनल सोशल वर्कर्स और उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय परिसर के संयुक्त तत्वावधान में ‘मानसिक स्वास्थ्य का महत्व’ विषय पर एकदिवसीय संगोष्ठी आयोजित की गई। मुख्य वक्ता विमल रतूड़ी ने कहा कि वर्तमान समय में समाज के हर वर्ग को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के अत्यधिक प्रभाव के कारण युवाओं में अकेलेपन और दूसरों से तुलना की प्रवृत्ति बढ़ रही है। वहीं, पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन को लेकर बच्चों पर बनाया जाने वाला दबाव भी उनके मानसिक तनाव को बढ़ा रहा है। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों की भावनाओं को समझने, उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनने और उनके साथ नियमित संवाद बनाए रखने की अपील की। प्रभारी निदेशक डॉ. सुभाष रमोला ने कहा कि स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए मानसिक स्वास्थ्य उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शारीरिक स्वास्थ्य। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपनी क्षमताओं का बेहतर उपयोग कर समाज के विकास में प्रभावी योगदान दे सकता है।कार्यक्रम संयोजिका डॉ. भावना डोभाल ने ‘मन स्वस्थ तो तन स्वस्थ’ का संदेश देते हुए अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. नरेंद्र जगूड़ी ने किया। उन्होंने मानसिक अवसाद के बढ़ते मामलों को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए व्यापक जागरूकता अभियान चलाने और समय रहते आवश्यक कदम उठाने पर जोर दिया।सहायक प्राध्यापक मुकेश कुमार यादव ने विश्वविद्यालय में विशेष शिक्षा के तहत संचालित कार्यक्रमों और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित पाठ्यक्रमों की जानकारी दी। संगोष्ठी में बृजमोहन खाती, कुंदन, अजय सिंह, अभिषेक सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में शिक्षार्थी मौजूद रहे।