उत्तराखंड की लोक विरासत का होगा भव्य संगम, 28-29 नवंबर को जुटेंगे 13 जिलों के 150 कलाकार-शिल्पकार

– पद्मश्री प्रीतम भरतवाण ढोल नाद से सजाएंगे विरासत का मंच

– लोकसंस्कृति, पहाड़ी खान-पान और हस्तशिल्प बनेगा आकर्षण

देहरादून। उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और विरासत को एक मंच पर समेटने के लिए दो दिवसीय उत्तराखंड लोक विरासत का भव्य आयोजन 28 और 29 नवंबर को हरिद्वार बाईपास रोड स्थित सोशल बलूनी पब्लिक स्कूल में होगा। उत्तराखंड लोक विरासत ट्रस्ट एवं चार धाम अस्पताल के अध्यक्ष डॉ. केपी जोशी ने बताया कि आयोजन में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे।

उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकारों से बातचीत करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि उत्तराखंड लोक विरासत केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रदेश के दूरदराज क्षेत्रों में छिपी प्रतिभाओं को पहचान और मंच देने का अभियान है। आयोजन के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों के कलाकारों, शिल्पकारों और आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाओं को प्रदेश स्तर पर अपनी कला और हुनर प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा। उन्होंने बताया कि इस वर्ष आयोजन में लोक संस्कृति के विविध रंग देखने को मिलेंगे। लोकरंग, लारा-लत्ता, गैणा-पत्ता, पहाड़ी खान-पान, युवाओं में बढ़ती बीमारियों और पारंपरिक जीवनशैली जैसे विषयों को गीत-संगीत और लोक प्रस्तुतियों के माध्यम से सामने रखा जाएगा। इसके साथ ही विशेष संगीत संध्या का आयोजन भी होगा। डॉ. जोशी ने बताया कि उत्तराखंड के सभी 13 जिलों से करीब 150 कलाकार और शिल्पकार लोक विरासत में भाग लेंगे। हस्तशिल्प प्रदर्शनी में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के पारंपरिक हस्तशिल्प और जिलेवार प्रसिद्ध उत्पादों को प्रदर्शित किया जाएगा। इससे स्थानीय उत्पादों और कारीगरों को बाजार से जोड़ने का भी प्रयास किया जाएगा। इस बार कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण पद्मश्री एवं जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण की विशेष प्रस्तुति होगी। वे ढोल नाद के माध्यम से उत्तराखंड की विभिन्न लोक विधाओं और प्रमुख ढोल परंपराओं को मंच पर जीवंत करेंगे। उनकी प्रस्तुति लोक विरासत के सांस्कृतिक रंग को और समृद्ध करेगी।

नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने की पहल

डॉ. जोशी ने कहा कि बदलते दौर में नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोक संस्कृति से जोड़ना बेहद जरूरी है। लोक विरासत के माध्यम से पहाड़ी भाषा, पारंपरिक खान-पान, आभूषण, लोकगीत, संगीत और उत्तराखंडी संस्कृति से युवाओं को परिचित कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि गीत-संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से पारंपरिक पहाड़ी खान-पान की उपयोगिता तथा युवाओं को बढ़ती बीमारियों से बचाने का संदेश भी दिया जाएगा। आयोजन का उद्देश्य संस्कृति के संरक्षण के साथ स्थानीय प्रतिभाओं और उत्पादों को प्रोत्साहित करना भी है। डॉ. जोशी ने कहा कि उत्तराखंड की लोक विरासत को व्यापक मंच देने के लिए भविष्य में भी इस तरह के प्रयास जारी रहेंगे। इस अवसर पर सुधीर नौटियाल भी पत्रकार वार्ता में उपस्थित रहे।

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