– ग्राफिक एरा में परंपरा, तकनीक और टिकाऊ भविष्य पर मंथन
देहरादून। हिमालय के पारंपरिक वस्त्र महज पहनावा नहीं, बल्कि पहाड़ की जलवायु, जीवनशैली, सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से संचित हुनर की जीवंत पहचान हैं। ऊन और पश्मीना की गर्माहट से लेकर भांग और बिच्छू घास के मजबूत रेशों तक, इन वस्त्रों के हर धागे में कठिन पहाड़ी परिस्थितियों से जूझने का अनुभव बुना है। इसी विरासत को आधुनिक तकनीक और टिकाऊ विकास से जोड़ने की संभावनाओं पर ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी में आयोजित संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने मंथन किया।
‘हिमालयी वस्त्र: परंपरा, तकनीक और टिकाऊ भविष्य’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी के समापन सत्र में विशिष्ट अतिथि सहायक निदेशक (हस्तशिल्प) गोपेश कुमार मौर्य ने कहा कि उत्तराखंड की हस्तशिल्प परंपरा राज्य की सांस्कृतिक पहचान के साथ आजीविका का भी महत्वपूर्ण आधार है। पारंपरिक शिल्प और वस्त्रों का संरक्षण स्थानीय हुनर को पहचान देने के साथ इससे जुड़े लोगों की आजीविका को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
संगोष्ठी में हिमालयी वस्त्रों की पारंपरिक तकनीकों, प्राकृतिक रेशों और उनकी उपयोगिता के साथ आधुनिक दौर में इनके संरक्षण और विकास की संभावनाओं पर विचार साझा किए गए। ऊंचाई वाले क्षेत्रों की कठोर जलवायु के अनुरूप विकसित पारंपरिक वस्त्र निर्माण की विधियां आज भी अपने व्यावहारिक ज्ञान और विशिष्ट बनावट के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन परंपराओं को समकालीन जरूरतों के अनुरूप आगे बढ़ाना वस्त्र एवं फैशन के क्षेत्र में नए अवसर पैदा कर सकता है।
देश-विदेश के शोधार्थियों ने साझा किए शोध
संगोष्ठी में कुल 13 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। न्यूयॉर्क और ब्रिटेन के प्रतिनिधियों के साथ देश के विभिन्न हिस्सों से शोधार्थी और रिसर्च स्कॉलर ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्रों और उनके सार के जरिए हिमालयी वस्त्र परंपरा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे। इस सहभागिता ने पारंपरिक वस्त्रों के अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय अकादमिक विमर्श से जोड़ने का अवसर प्रदान किया।
कार्यक्रम का आयोजन ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी के फैशन डिजाइनिंग विभाग, टेक्सटाइल्स एंड क्लोदिंग रिसर्च सेंटर और जयपुर स्थित भारतीय शिल्प संस्थान (आईआईसीडी) ने संयुक्त रूप से किया। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. ज्योति छाबड़ा सहित शिक्षक-शिक्षिकाएं और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। संगोष्ठी के माध्यम से हिमालयी वस्त्र विरासत को संरक्षित करने, उससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान को अकादमिक शोध से जोड़ने और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप विकसित करने पर जोर दिया गया।