विरासत में एन. राजम के वायलिन का जादू, मंजरी चतुर्वेदी की ‘तवायफ स्टोरी’ ने छुआ दिल

देहरादून। विरासत महोत्सव-2026 की सांस्कृतिक संध्या भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोकनृत्य और इतिहास के अनछुए पहलुओं के नाम रही। नींबूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित कार्यक्रम में पद्म भूषण से सम्मानित प्रख्यात वायलिन वादक डॉ. एन. राजम की प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कथक नृत्यांगना मंजरी चतुर्वेदी की ‘चांदनी महफिल’ के अंतर्गत ‘द तवायफ स्टोरी’ ने भारतीय संगीत और उन महिला कलाकारों की विरासत से रूबरू कराया, जिन्हें इतिहास में अपेक्षित पहचान नहीं मिल सकी। श्रीलंका के ‘अलाप कोलंबो फोक डांस एन्सेम्बल’ ने भी अपनी लोकनृत्य प्रस्तुतियों से दर्शकों का ध्यान खींचा।

रिच संस्था की ओर से आयोजित महोत्सव में डॉ. एन. राजम ने अपने वायलिन वादन से शास्त्रीय संगीत की गहराई और रागों की खूबसूरती को प्रस्तुत किया। उनके साथ वायलिन पर प्रशांत मिश्रा और तबले पर पंडित अभिषेक मिश्रा ने संगत की। रागों और उपशास्त्रीय रचनाओं की प्रस्तुति ने संगीत प्रेमियों को भावविभोर किया। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठित साधिका डॉ. राजम बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संगीत की प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष और प्रदर्शन कला संकाय की डीन रह चुकी हैं। संध्या का एक अन्य प्रमुख आकर्षण मंजरी चतुर्वेदी की ‘द तवायफ स्टोरी’ रही। ‘चांदनी महफिल’ के माध्यम से उन्होंने मुख्तार बेगम, जद्दनबाई और नवाब जान जैसी महिला कलाकारों के योगदान को सामने रखा। प्रस्तुति ने उन कलाकारों की सांगीतिक विरासत पर ध्यान केंद्रित किया, जिनकी रचनाएं लोकप्रिय हुईं, लेकिन जिनके नाम और योगदान को इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। ‘आज जाने की ज़िद न करो’ जैसी रचना के सांस्कृतिक सफर के माध्यम से भी संगीत की परंपरा और उसके बदलते संदर्भों को रेखांकित किया गया।

श्रीलंका के सात सदस्यीय ‘अलाप कोलंबो फोक डांस एन्सेम्बल’ ने डॉ. अंजलि मिश्रा के नेतृत्व में ‘सोल सूत्र’ के तहत अपनी सांस्कृतिक विरासत प्रस्तुत की। दल ने कांडियन यानी ‘वेस’ नृत्य शैली सहित पारंपरिक लोकनृत्यों की झलक दिखाई। कलाकारों की ऊर्जावान भाव-भंगिमाओं ने दर्शकों को श्रीलंका की लोक परंपराओं से परिचित कराया। इससे पहले विरासत साधना के मंच पर विभिन्न विद्यालयों और संस्थानों के विद्यार्थियों ने कथक और भरतनाट्यम की प्रस्तुतियां दीं। द टोंस ब्रिज स्कूल, समर वैली स्कूल, दून विश्वविद्यालय, आईएमएस यूनिसन विश्वविद्यालय, दून इंटरनेशनल स्कूल और अन्य संस्थानों के विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा दिखाई। लतिका फाउंडेशन से जुड़े दिव्यांग बच्चों ने गढ़वाली लोकनृत्य प्रस्तुत कर उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को मंच पर जीवंत किया। आयोजन में शास्त्रीय कला, लोक परंपरा और समावेशी सहभागिता का सुंदर संगम देखने को मिला।

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