– 60 लोकधुनें, 125 से अधिक पात्र और 165 दृश्य बने आकर्षण
देहरादून। गढ़वाली संवाद, लोकगीतों की मधुरता और पारंपरिक चौपाइयों की गूंज के बीच सोशल बलूनी पब्लिक स्कूल (एसबीपीएस) में रविवार को गढ़वाली रामलीला का भव्य मंचन हुआ। लोकभाषा और संस्कृति के रंग में रंगे खचाखच भरे सभागार में कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से रामकथा को जीवंत कर दिया। कहीं लोकधुनों ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर किया तो कहीं भावपूर्ण प्रसंगों ने उन्हें भावुक कर दिया। कुलानंद घनशाला द्वारा रचित और निर्देशित इस रामलीला में गढ़वाल की लोकविरासत की झलक के साथ मातृभाषा के संरक्षण का संदेश भी देखने को मिला।
दस दिनों की रामलीला की कथा को लगभग ढाई घंटे में मंच पर प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुति में 60 लोकधुनों पर आधारित गीत, दोहे और चौपाइयां शामिल रहीं। 450 से अधिक गेय रचनाओं, 125 से अधिक पात्रों और 165 दृश्यों से सजी इस रामलीला ने दर्शकों को गढ़वाली लोकनाट्य परंपरा से रूबरू कराया। कलाकारों के अभिनय और संगीत के तालमेल ने कई दृश्यों को विशेष प्रभावशाली बना दिया।
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पूर्व सूबेदार जनार्दन प्रसाद बलूनी ने कहा कि शिक्षा के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को जोड़ना जरूरी है। मातृभाषा हमारी पहचान है और इसका संरक्षण हम सभी की जिम्मेदारी है। विशिष्ट अतिथि एसपी विजिलेंस उत्तम नेगी और पूर्व कैप्टन सुरेंद्र सिंह रावत ने भी विद्यार्थियों को अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि गढ़वाली जैसी लोकभाषाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में रामलीला जैसे आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।एसबीपीएस के प्रबंध निदेशक विपिन बलूनी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि लोकभाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए ऐसे आयोजन आवश्यक हैं। गढ़वाली रामलीला लोकसंस्कृति का भव्य अनुष्ठान है और विद्यालय इस दिशा में प्रयास जारी रखेगा।
40 वर्षों के अनुभव से रची लोकनाट्य प्रस्तुति
रामलीला के रचनाकार एवं निर्देशक कुलानंद घनशाला ने बताया कि यह प्रस्तुति उनके चार दशक के रंगमंचीय और साहित्यिक अनुभवों का परिणाम है। इसमें गढ़वाल की प्रचलित लोकधुनों का व्यापक प्रयोग करते हुए रामकथा को विशिष्ट लोकनाट्य शैली में पिरोया गया है। गढ़वाली भाषा, लोकसंगीत और पारंपरिक गायन इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं।संगीत निर्देशन लोकगायक ओम बधानी ने किया। गीतों को उत्तराखंड के लोकगायकों नीता कुकरेती, रेखा धस्माना, आशा भट्ट, ओम बधानी, विवेक नौटियाल, चंद्रदत्त सुयाल, अभिनव रावत, राकेश भट्ट, ओमप्रकाश सेमवाल और गिरीश सुंदरियाल ने स्वर दिए।
कलाकारों ने जीवंत किए रामायण के पात्र
मंचन में आयुष रावत ने राम, प्रियंका बडोला ने सीता, मोहित शर्मा ने लक्ष्मण, हर्ष पांडेय ने भरत, दिनेश भंडारी ने रावण, रामेंद्र कोटनाला ने दशरथ और अनिल नेगी ने हनुमान की भूमिका निभाई। तान्या चौहान ने शूर्पणखा और मनीषा रावत ने ताड़का के चरित्र को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। सूत्रधार के रूप में मदन मोहन डुकलाण ने ब्राह्मण और इंदु रावत ने ब्राह्मणी की भूमिका निभाई। अन्य कलाकारों ने भी अपने अभिनय से दर्शकों की सराहना बटोरी।
एसबीपीएस पिछले कई वर्षों से लोकविरासत के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित करता रहा है। गढ़वाली रामलीला का मंचन इसी परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी रहा। कार्यक्रम में देहरादून के अनेक रंगकर्मी, साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी मौजूद रहे।